ये 5 बातें साई बाबा के बारे में ज़रूर जाने

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साई बाबा

ये 5 बातें साई बाबा के बारे में ज़रूर जाने

“सबका मालिक एक” कहने वाले शिरडी के साई बाबा के बारे में कुछ ऐसी बाते जिसे जान कर आपके मन को काफी संतुष्टि मिलेगी । यह 5 बाते आप जरूर जाने शिरडी के साई बाबा के बारे में ।

1.) कहा हुआ शिरडी के साई बाबा का जन्म ?

महाराष्ट्र के पाथरी (पातरी) गांव में सांईं बाबा का जन्म २८ सितंबर १८३५ को हुआ था। तथा स्वय को सांई का अवतार मानने वाले सत्य सांई बाबा ने बाबा का जन्म २७ सितंबर १८३० को बताया है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि महाराष्ट्र के परभणी जिले के पाथरी गांव में सांई बाबा का जन्म हुआ था और सेल्यु में बाबा के गुरु वैकुंशा रहते थे। यह हिस्सा हैदराबाद निजामशाही का एक भाग था। भाषा के आधार पर प्रांत रचना के चलते यह हिस्सा महाराष्ट्र में आ गया तो अब इसे महाराष्ट्र का हिस्सा माना जाता है। महाभारत काल में पांडवों ने यहां अश्वमेध यज्ञ किया था, तब अर्जुन अपनी फौज लेकर यहां उपस्थित थे। अर्जुन को पार्थ भी कहा जाता है। यही पार्थ बिगड़कर पाथरी हो गया। अब पातरी व पात्री कहा जाता है । सांई के जन्म स्थान पाथरी (पातरी) पर एक मंदिर बना है। मंदिर के अंदर सांई की आकर्षक मूर्ति रखी हुई है। यह बाबा का निवास स्थान है, जहां पुरानी वस्तुएं जैसे बर्तन, घट्टी और देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी हुई हैं ।
मंदिर के व्यवस्थापकों के अनुसार यह सांई बाबा का जन्म स्थान है।

2.) कौन हैं साई बाबा के माता पिता ?

सांई के पिता का नाम गोविंद भाऊ और माता का नाम देवकी अम्मा है। कुछ लोग उनके पिता का नाम गंगाभाऊ बताते हैं और माता का नाम देवगिरी अम्मा। उनके माता-पिता को भगवंत राव और अनुसूया अम्मा भी कहा जाता है। वे यजुर्वेदी ब्राह्मण होकर कश्यप गोत्र के थे। सांई ब्राह्मण परिवार के थे । सांई बाबा गंगाभाऊ और देवकी के तीसरे पुत्र थे। उनका नाम हरिबाबू भूसारी था । सांई बाबा का परिवार हनुमान भक्त था। वे उनके कुल देवता हैं। सांई बाबा पर हनुमानजी की कृपा थी।

3.) साई बाबा के पठन पाठन की कहानि

साई बाबा की शिक्षा उनके घर से ही आरम्भ हुआ था । उन्होंने अपने पिता के संरक्षण में ही काफी तेज़ी से वेद पुराण पढ़ना सुरु कर दिया और बहुत कम उम्र में ही पढ़ने लिखने लगे । ७ से ८ के छोटे से उम्र में ही उंकने पिता ने उनका दाखिला पाथरी के गुरुकुल में करा दिया था । गुरुकुल में ब्राह्मणों को वेद- ‍पुराण आदि पाठ पढ़ाया जाता था। जब सांई ७ से ८ वर्ष के थे , तो अपने गुरुकुल के गुरु से शास्त्रार्थ करते थे। साई को गुरुकुल में वेदों की बाते काफी पसन्द आयी परन्तु पुराण से वे सहमत न थे । और इसी विषय पर वे अपने गुरु से काफी बहस भी करते रहते थे । वे पुराणों की कथाओं से संभ्रमित थे , और उनके खिलाफ थे। वे गुरु से इस विषय में चर्चा करते थे। गुरु उनके तर्कों से परेशान रहते थे। वे वेदों के अंतिम और सार्वभौमिक सर्वश्रेष्ठ संदेश ‘ईश्वर निराकार है’ इस मत को ही मानते थे। अंत में हारकर गुरु ने कहा- एक दिन तुम गुरुओं के भी गुरु बनोगे। सांई ने वह गुरुकुल छोड़ दिया। गुरुकुल छोड़कर वे हनुमान मंदिर में ही रहने लगे । जहां वे हनुमान पूजा करते और सत्संगियों के साथ रहते थे । उन्होंने काफी छोटी आयु ८ वर्ष में ही संस्कृत बोलना तथा पढ़ना सीख लिया था। उन्होंने चारों वेद तथा ८ पुराणों का अध्ययन कर लिया था।

4.) कैसे पहौचे साई बाबा , शिरडी ?

ऐसा माना जाता हैं कि साई बाबा अपने किशोरावस्था में युही घूमते फिरते शिरडी पहुँचे । उस वक्त शिरडी में बहौत कम लोग रहा करते थे । बाबा चलते चलते एक नीम के वृक्ष के पास पहुँचे वहा उस वृक्ष के आस पास एक चबूतरा बना था , और जैसा की हम जानते है बाबा ने अपना जीवन एक फकिर कि तरह व्यतित किया हैं । वे काफी साधारण तरीके से अपना जीवन व्यतीत करते थे । समाज के सेवा में बाबा ने अपना जीवन बिता दिया । वे एक भिक्षुक के तरह रहा करते थे । भिक्षा मांग कर वापस वे उसी नीम के वृक्ष के नीचे उसी चबुरते पर आकर बौठ जाया करते थे । यह देख लोगों के मन में बहौत सारी प्रस्सन उतपन्न होती थी । कुछ लोग तो उनका मजाक भी उड़ाते थे । लेकिन बाबा इतने विन्रम तथा सेहनसिल स्वभाव के थे , की वे किसी भी बात को अपने दिल पे नही लेते थे । वे हर बात को मुस्कुरा कर टाल देते थे । यह दृश्य देखते देखते एक दिन लोगों ने बाबा से पूछ ही लिया की आप हर जगह से घूम फिर कर इसी वृक्ष के नीचे क्यों बैठते है ? तो बाबा ने बहौत ही विन्रमता पूर्वक मुस्कुराते हुए जवाब दिया की यह स्थान मेरे गुरु की हैं । यह वाक्य सुनते ही लोगों ने फिर उनका मजाक उड़ाते हुए कहा ये कैसी बात बोल रहे है आप ? बाबा ने इसका भी जवाब बहौत ही विनम्रता पूर्वक दिया और कहा अगर आपलोगो को मेरे बातो पे विस्वास ना हो रहा हो तो आप इस स्थान को खुद्वा कर देख लीजिये । जब लोगो ने उस स्थान पर खुदाई करवाई तो एक सिले के निचे उन्हें ४ दीप जलते हुए दिखाई दिये । यह चमत्कार देख वाहा पे मौजूद सभी लोग अचंभित रह गये । ये तो बस एक छोटी सि चमत्कार थी जो लोगो ने देखा था ऐसे अनगिनत चमत्कार बाबा के द्वारा किया गया है जिसकी वजह से लोग उन्हें भगवान का दर्जा देते आये है ।

5.) कैसे हुआ साई शरीर का अंत ?

साईं बाबा अपने अंतिम दिनों में अपने भक्तो से धार्मिक पुस्तके पढवाते थे तथा उन्हें उस पुस्तक का आंतरिक ज्ञान समझाते थे । ८ अक्टूम्बर १९१८ को बाबा साई बहूत कमजोर हो गये थे । वे मस्जिद की दीवार पर बैठ गये थे । आरती और पूजा रोज की तरह होती थी रही । भक्तो को साई बाबा के पास जाने नही दिया जा रहा था । साई बाबा अपने अंतिम दिनों में कमजोर होते जा रहे थे । लेकिन उसके बावजूद भी उन्होंने अपने इस बीमारी में भी अपने भक्तो से मिलना , उन्हें ज्ञान देना नही छोड़ा । वे तो अपना सबकुछ पहले से ही अपने भक्तो के नाम कर चुके थे । उनके सभी भक्त बाबा की बीमारी से बहूत दुखी थे , और प्रार्थना कर रहे थे की साई बाबा जल्द से जल्द ठीक हो जाए । मंगलवार १५ अक्टूबर १९१८ विजयदशमी का दिन था । साई बाबा बहूत कमजोर हो गये थे । रोज की तरह भक्त उनके दर्शन के लिए आ रहे थे । साईं बाबा उन्हें उड़ी प्रसाद दे रहे थे । भक्त बाबा से ज्ञान भी प्राप्त कर रहे थे , पर किसी भक्त ने यह नही सोचा था की आज बाबा के शरीर का अंतिम दिन है । सुबह ११ बजे का समय था । आरती हो रही थी । आरती पूर्ण हुई और बाबा ने अपने भक्तो से कहा की अब आप सभी लोग मुझे अकेला छोर दे । सभी भक्त वहा से चले गये । साई बाबा को तब एक जानलेवा खांसी चली और खून की उलटी हुई । बाबा का एक तात्या नामक भक्त तो मरण के एकदम करीब था । परन्तु वो अब ठीक हो गया था । उसे पता भी न चला की वो किस चमत्कार से ठीक हुआ है । वह बाबा को धन्यवाद देने बाबा के निवास आने लगा पर बाबा का सांसारिक शरीर तो यही रह गया था । साईं बाबा ने कहा था की मरने का बाद उनके शरीर को बुट्टी वाडा में रख दिया जाए वो अपने भक्तो कि हमेशा सहयता करते रहेगें । और इसी प्रकार “सबका मालिक एक” कहने वाले शिरडी के साई बाबा की शरीर हमारे बीच से चलि गयी ।

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